जब पुलिस की बगावत ने गिरा दी थी उत्तर प्रदेश सरकार

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लखनऊ के गोमतीनगर इलाके में 29 सिंतबर को हुए विवेक तिवारी हत्याकांड मामले मं एकतरफा कार्रवाई का आरोप लगाते हुए पुलिस विभाग के सिपाहियों में बगावत की चिंगारी भड़क उठी है। सिपाहियों ने इसके लिए पिछले कई दिनों से सोशल मीडिया पर कैंपेन चला रखा है। जिसमें कहा जा रहा है कि प्रशांत चौधरी को गलत फंसाया जा रहा है। आरोपी प्रशांत चौधरी के समर्थन में सिपाही काली पट्टी बांधकर प्रदर्शन कर रहे हैं।

इससे पहला एक और मामला हुआ

अगर पहले मामले की बात करें तो कुछ समय पहले इलाहाबाद पुलिस के एक सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह जो कभी नारी बारी पुलिस चौकी का इंचार्ज हुआ करता थे, उन पर कचहरी में प्राणघातक हमला हुआ था। जिसमे उनकी जान तक जाने का अंदेशा था।

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हमला करने वाले का नाम नबी अहमद था जो कम से कम आधा दर्जन मुकदमों में नामजद था। कहा जाता है कि अपनी जान बचाने के लिए सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह ने गोली चला दी थी, जिसमे हमलावर नबी अहमद मौके पर ही मारा गया था। इस पूरी घटना का वीडियो भी जनता में वायरल हुआ है जिसमे नबी अहमद को सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह की पिटाई करते हुए देखा जा सकता है।

हो गया था विद्रोह

बात 1973 की है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी, मुख्यमंत्री पं. कमलापति त्रिपाठी थे। घटिया खाना मिलने से पीएसी के जवानों और पुलिसकर्मियों में रोष था, दबी जुबां से शिकायती स्वर उभरे मगर अफसरों ने इसे नजरअंदाज कर दिया। तब इंटरनेट और सोशल मीडिया जैसी कोई सुविधा तो थी नहीं। लखनऊ में अंग्रेजी में नेशनल हेराल्ड और पायनियर और हिन्दी में स्वतंत्र भारत और नवजीवन आदि प्रमुख अखबार छपते थे।

यही जनता की आवाज बनते थे। शायद तब के पत्रकार भी प्रदेश के पीएसी जवानों की पीड़ा को नहीं समझ सके। कहा जाता है कि एक छोटे अखबार ने तब सिंगल कालम खबर छापी थी जिसमें जवानों को घटिया खाना दिये जाने का जिक्र किया गया था मगर आला अफसरों के कानों तक उस छोटे अखबार की आवाज नहीं पहुंच सकी।

सेना और पीएसी के जवान आमने-सामने

मई 1973 में पीएसी जवानों में असंतोष फूट पड़ा और वो बगावत पर उतारू हो गये। राज्य सरकार के हाथ-पांव फूल गये, दिल्ली तक खलबली मच गई। आनन-फानन सेना को बुलाना पड़ा। लखनऊ में सड़कों पर सेना के वाहन दौड़ने लगे। सेना ने वहां पुलिस लाइन्स को चारो ओर से घेर लिया। विद्रोही पी.ए.सी.जवान और सेना आमने-सामने आ गई।

तीन जवानों की हुई थी मौत

कहा जाता है कि सेना की गोलीबारी में कम से कम तीस विद्रोही जवान मारे गए। सौ से अधिक जवानों को गिरफ्तार किया गया था। सेना ने जैसे-तैसे विद्रोहियों पर काबू तो कर लिया मगर मुख्यमंत्री पं. कमलापति त्रिपाठी को अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी। 12 जून 1973 को उन्होंने इस्तीफा दे दिया, प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। विद्रोह तो दबा दिया गया मगर विद्रोहियों ने राज्य सरकार की बलि तो ले ही ली थी।

यूपी-पीएसी के 12 बटालियनों ने विद्रोह किया

उत्तर प्रदेश की पीएसी के कुछ काले अध्याय भी जुड़े हुए हैं। जब मई 1973 में यूपी-पीएसी के 12 बटालियनों ने विद्रोह किया और सेना को नियंत्रण के लिए बुलाया गया। जिसमें लगभग 30 पुलिसकर्मियों की मृत्यु हो गई। और सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया, और सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। 1982 में यूपी-पीएसी को खत्म करने की दो याचिकाएं सर्वोच्च न्यायालय में दायर की गईं। जिसे बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया।

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