तारीख 25 मार्च। एक साधारण दिन? जी नहीं!
कल्पना कीजिए…
आप एक ऐसी दुनिया में हैं, जहाँ इंसानों की नीलामी होती है. जहाँ किसी की मूल्य सिर्फ कुछ सिक्कों में लगाई जाती है. जहाँ बच्चे अपनी माँ की गोद से छीन लिए जाते हैं…. जहाँ पुरुषों की पीठ पर कोड़ों के निशान गिने नहीं जाते, बल्कि गहरे होते जाते हैं. यह कोई फिल्म की कहानी नहीं, बल्कि हकीकत थी. 16वीं से 19वीं सदी तक लाखों लोगों की ज़िंदगी ऐसे ही बर्बाद हुई. और यह इतिहास सिर्फ किताबों में दफन नहीं, बल्कि आज भी आधुनिक दुनिया में जीवित है.
25 मार्च, यह वह दिन है जब दुनिया सबसे क्रूर सामाजिक अपराध- दास प्रथा (दासता) के पीड़ितों को याद करती है. यह कहानी उन्हीं जंजीरों की है जो सिर्फ शरीर को ही नहीं, बल्कि आत्मा को भी कैद कर लेती थीं.
जब इंसान, इंसान नहीं रहा…
दास प्रथा (Slavery) दुनिया की सबसे अमानवीय प्रथाओं में से एक रही है. हजारों सालों तक यह कई सभ्यताओं में रही- मिस्र की पिरामिड बनाने वाले मजदूर हों या रोम की लड़ाई में झोंक दिए गए योद्धा. हालांकि इसकी पुष्टि नहीं हो पाई है कि मिस्र की पिरामिड बनाने वाले दास प्रथा से प्रताड़ित मजदूर थे या फिर वेतनभोगी मजदूर क्योंकि कुछ इतिहासकारों का मानना है कि वेतनभोगी मजदूरों ने काम किया था दासों ने नहीं. लेकिन सबसे भीषण दास व्यापार 16वीं से 19वीं सदी के बीच हुआ, जिसे “अटलांटिक दास व्यापार” (Atlantic slave trade) कहा जाता है.
इसमें अफ्रीका से लाखों लोगों को जबरन पकड़कर अमेरिका, यूरोप और कैरेबियाई देशों में बेचा जाता था. वे खेतों में, खदानों में, फैक्ट्रियों में- जहां भी मुनाफा हो, वहां काम करने को मजबूर किए जाते. यह सिलसिला सदियों तक चला और इसका प्रभाव आज भी दुनिया पर देखा जा सकता है.
तो 25 मार्च क्यों है खास?
संयुक्त राष्ट्र ने 25 मार्च को “अंतरराष्ट्रीय दासता पीड़ित स्मरण दिवस” (International Day of Remembrance of the Victims of Slavery and the Atlantic Slave Trade) घोषित किया. यह उन करोड़ों मासूम लोगों को याद करने का दिन है, जिन्हें बेड़ियों में जकड़कर एक वस्तु की तरह बेचा गया. यह दिन हमें यह भी याद दिलाता है कि दासता खत्म नही हुई है बस इसके तरीके बदले हैं.
भारत और दास प्रथा: क्या हम सच में आज़ाद हैं?
भारत में भी सदियों तक दासता का अस्तित्व रहा- राजाओं के दरबार में सेवक, मंदिरों में देवदासियां, ज़मींदारों के बंधुआ मजदूर. ब्रिटिश शासन के दौरान, लाखों भारतीयों को भी दासों की तरह विदेशी देशों में मजदूरी के लिए भेजा गया.
1843 में ब्रिटिश सरकार ने भारत में दासता को गैरकानूनी घोषित किया, लेकिन क्या यह पूरी तरह मिट गई?
बंधुआ मजदूरी (Bonded Labour)
बाल श्रम (Child Labour)
मानव तस्करी (Human Trafficking)
महिलाओं की खरीद-फरोख्त
यह सब आज भी आधुनिक दासता के रूप में मौजूद हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि अब यह खुलेआम नहीं होता, बल्कि छिपकर होता है.
क्या सच में दासता खत्म हो गई है?
आज भी दुनिया में 4 करोड़ से ज्यादा लोग आधुनिक दासता (Modern Slavery) के शिकार हैं. इनमें से लाखों भारत में ही हैं. यह मजबूरी में की जाने वाली मजदूरी, बच्चों का शोषण, और महिलाओं की तस्करी के रूप में मौजूद है.
21वीं सदी का भारत
भारत में प्रभावित लोगों की संख्या- 2016 में, वैश्विक दासता सूचकांक के अनुसार, भारत में लगभग 1.8 करोड़ लोग आधुनिक दासता के शिकार हुए.
2016 की तुलना में, 2022 तक आधुनिक दासता के मामलों में 10 मिलियन (1 करोड़) की वृद्धि हुई.
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन और अंतर्राष्ट्रीय प्रवासन संगठन के आधुनिक दासता के नवीनतम वैश्विक अनुमान (2022) के अनुसार- 49.6 मिलियन लोग आधुनिक गुलामी में जी रहे हैं.
महिलाओं और लड़कियों पर प्रभाव- वॉक फ्री एंटी-स्लेवरी ऑर्गनाइजेशन की रिपोर्ट के अनुसार, हर 130 महिलाओं और लड़कियों में से एक आज आधुनिक गुलामी में जी रही है.
आधुनिक दासता के रूप- भारत में आधुनिक दासता के विभिन्न रूप प्रचलित हैं, जिनमें बंधुआ मजदूरी, बाल मजदूरी, जबरन विवाह, मानव तस्करी, व्यावसायिक यौन शोषण और घरेलू दासता शामिल हैं.
क्या हम अब भी बेड़ियों में जकड़े हैं?
25 मार्च सिर्फ इतिहास याद करने का दिन नहीं, बल्कि सोचने का दिन है कि क्या हम सच में आज़ाद हैं? अगर कोई बच्चा मजदूरी कर रहा है, अगर किसी महिला को उसकी मर्जी के खिलाफ बेचा जा रहा है- तो क्या यह किसी दासता से कम है?
तो इस 25 मार्च पर सिर्फ इतिहास मत पढ़िए, बल्कि सोचिए- क्या हम अब भी जंजीरों में जकड़े हुए हैं?
ALSO READ: The Coinage Act, 2011: सिक्कों से जुड़े 11 सख्त नियम, तोड़ने पर हो सकती है जेल!