अफगानिस्तान को लेकर सभी विजन हो गए ग्लोबल से लोकल !

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यह लेखक के निजी विचार हैं। यह लेख लेखक के फेसबुक वॉल से लिया गया है।

समरेंद्र सिंह वरिष्ठ पत्रकार

 

अफगानिस्तान में अल्लाह की असली हुकूमत अब कायम हुई है! अल्लाह-अल्लाह करते हुए आप सभी विजन ग्लोबल से लोकल कीजिए!
ये कई साल पुरानी घटना है। उस दिन पाकिस्तान के वामपंथी लाल बैंड का कार्यक्रम प्रेस क्लब में रखा गया था। शानदार भूमिका के बाद वामपंथी बैंड ने क्रांति गीत गाए। उसी बीच में एक गायक ने कहा कि लेनिन जब अल्लाह के पास गए तो अल्लाह ने कहा… अब क्या कहा इसे छोड़ दीजिए। अल्लाह ने कुछ खास नहीं कहा होगा क्योंकि लेनिन अल्लाह के पास नहीं गए होंगे। और रास्ता भटक कर कभी गए भी होंगे तो गॉड के पास गए होंगे। अल्लाह, गॉड और ईश्वर एक नहीं हैं।

खैर, पाकिस्तान में मार्क्स, लेनिन, स्टालिन से लेकर इमरान, जावेद, मुशर्रफ और राम, श्याम, बलराम – सब अल्लाह के पास जाते हैं। जो नहीं जाते वो अल्लाह को प्यारे हो जाते हैं। सब तख्त गिराने और ताज उछालने वाले फैज को भी कई बार अल्लाह के पास जाना पड़ा। उन्होंने कहा कि वो नास्तिक नहीं हैं, उनका मजहब में यकीन है। इस्लाम में यकीन है। बाकी जो लड़ाई है वो निजाम से है। इकबाल को भी जाना पड़ा था। खुदा से सवाल पूछते-पूछते अल्लाह अल्लाह करने लगे।

दरअसल, निजाम की लड़ाई और मजहब और जमात की लड़ाई अलग-अलग है। निजाम बदलने की लड़ाई अपने यहां भी जोर-शोर से चल रही है। प्रणय रॉय, रवीश कुमार, राजदीप सरदेसाई, पुण्य प्रसून वाजपेयी और अपूर्वानंद जैसे प्रोग्रेसिव पंडे सत्ता बदलने के अभियान में जुटे हैं। इनसे कहिए कि जरा धर्म की खाल खींच दो, हिंदू धर्म के मठों को चुनौती दे दो। वेदों को ललकार दो। कर्म की सही व्याख्या कर दो, धर्म के ऑर्डर को पलटने की बात कर दो तो दुम उसी तरह पिछवाड़े में घुस जाएगी जैसे फैज और इकबाल साहब की घुस जाती थी।

हमारे यहां प्रोग्रेसिव मुसलमान की परिभाषा भी अजीब है। जैसे कुछ आले दर्जे के धूर्त ये कहते हैं कि जिन्ना प्रोग्रेसिव था। कैसा प्रोग्रेसिव था? शराब पीता था। दाढ़ी-मूंछ नहीं रखता था। विदेशी कपड़े पहनता था। रंगीन मिजाज था। प्रोग्रेसिव होने की ऐसी ऐतिहासिक व्याख्या कम ही मिलती है। उस लिहाज से हमारे यहां 80-90 प्रतिशत ब्राह्मण प्रोग्रेसिव निकलेंगे। वो तो इतने प्रोग्रेसिव हैं कि आप ज्यादा बोलिएगा तो कहेंगे – ये कायदे-कानून हमारे लिए नहीं हैं। है न क्रांतिकारी ख्याल। जो धर्म के शीर्ष पर है, जिसने धर्म के कायदे-कानून बनाए हैं – वो कायदे कानून उसके लिए नहीं हैं।

मेरा एक मित्र ब्राह्मण शिरोमणी अटल बिहारी वाजपेयी का उदाहरण दिया करता है। हमारे अटल जी अमेरिका दौरे पर गए थे और वहां खाने की पांत में बीफ भी परोसा गया था। अटल जी बोटी उठाने लगे तो किसी ने टोका कि हुजूर ये गाय है। गाय हमारी माता है। अटल जी ने कहा ये हमारी नहीं अमेरिकियों की माता है। मतलब इससे अधिक प्रोग्रेसिव कोई हो सकता है क्या?

किसी भी क्लब और पब में जाइएगा तो हमारे मुसलमान भाई शराब पीते और दम लगाते दिख जाएंगे। बिना दाढ़ी-मूछ वाले कूल डूड भी दिखेंगे – लगेगा कि कितने प्रोग्रेसिव हैं। और जब इतने प्रोग्रेसिव हैं तो फिर दिक्कत किस बात की है। दिक्कत नहीं होनी चाहिए।

तो दिक्कत कहां है? दिक्कत प्रोग्रेसिव की परिभाषा और धर्म की बुनियाद में है। उन दैवीय किताबों में है जो लिखी गई हैं। जिनके नाम पर लोगों के जीवन में चरस बोई जाती है। और इन किताबों और अल्लाह, गॉड और ईश्वर की व्याख्या पर सारे प्रोग्रेसिव चुप हो जाते हैं। कुरान और गीता पर बात करते ही तौबा-तौबा करने लगते हैं।

लिहाजा अफगानिस्तान में क्रांति हो चुकी है। अल्लाह के करम से मजहबी राज कायम हो गया है। इसके साथ ही हमारे प्रोग्रेसिव मुसलमानों और उनके प्रोग्रेसिव हिंदू दोस्तों की दृष्टि ग्लोबल से लोकल हो गई है। फिलीस्तीन, म्यांमार, सीरिया, अमेरिका, कनाडा, यूरोप और न्यूजीलैंड कहीं कुछ हो जाए तो फिर ग्लोबल हो जाएगी। अभी कुछ दिन लोकल प्रोग्रेस होगी। विजन हो तो ऐसा!

अल्लाह कमाल है! मुहम्मद भी कमाल है! पैगंबर का प्रोग्रेसिव लौंडा तो लाजवाब है!

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-Adv-

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