अनोखा है कानपुर का जगन्नाथ मंदिर, गर्भगृह में लगा चमत्कारी पत्थर करता है ‘भविष्यवाणी’

उत्तर प्रदेश के कानपुर जनपद में स्थित भगवान जगन्नाथ का मंदिर जो की अपनी एक अनोखी विशेषता के कारण प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि कानपुर में स्थित ये प्रसिद्ध मंदिर मानसून आने की दस्तक पहले ही दे देता है।

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भारत एक धर्म प्रधान देश है। और यह एक प्रमुख वजह है कि हमारी संस्कृति सदियों से इस मजबूत डोर में बंधी होने के वजह से ‘अक्षुण्ण’ रही है।सम्पूर्ण विश्व में भारत ही एक ऐसा देश है जहाँ हर कदम पर आस्था और धर्म के विभिन्न स्वरूपों के आसानी से दर्शन हो जाते हैं। यहाँ हर चीजें भगवान के एक आदेश या संकेत के तौर पर देखी और समझी जाती हैं। भारत देश के हर राज्य के हर शहर के कोने कोने में कोई न कोई अद्भुत जगह मौजूद है। ऐसी ही एक जगह है उत्तर प्रदेश के कानपुर जनपद में स्थित भगवान जगन्नाथ का मंदिर जो की अपनी एक अनोखी विशेषता के कारण प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि कानपुर में स्थित ये प्रसिद्ध मंदिर मानसून आने की दस्तक पहले ही दे देता है।

जगन्नाथ मंदिर:

शहर से करीब 50 किमी दूर और भीतरगांव ब्लाक मुख्यालय से महज तीन किमी दूर बेहटा बुजुर्ग गांव में स्थित जगन्नाथ मंदिर अनेक रहस्य समेटे है। अतिप्राचीन मंदिर में भगवान जगन्नाथ, सुभद्रा और बलभद्र की प्राचीन प्रमिमाएं स्थापित हैं। मंदिर के गर्भगृह में स्थापित प्रतिमाएँ काले पत्थरों पर तराश कर बनाई गई हैं।

मानसून आने की दस्तक देता है:

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जगन्नाथ मंदिर से टपकने वाली पानी की बूंदों का रहस्य बिलकुल अनोखा है।  भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा के एक ऊपर एक ऐसा चमत्कारी पत्थर लगा हुआ है, जहाँ से जल की बूँदें टपकती हैं। पूरे साल सूखे रहने वाले इस पत्थर से मानसून आगमन के 7-15 दिन पहले बूँदों का रिसाव शुरू हो जाता है। आश्चर्य तो तब होता है जब बरसात आते ही ये बूंदे सूख जाती हैं। माना जाता है कि पानी की बूंदे जितनी बड़ी होती हैं उतनी ही अच्छी बारिश की संभावना होती है। वही ग्रामीणों का मानना है कि यदि इस चमत्कारी पत्थर से पानी की बूंदे नहीं टपकती हैं तो इसे अशुभ माना जाता है। यह इस बात का संकेत है कि प्रदेश में सूखा पड़ने वाला है। बीते सैकड़ों वर्षों से लोग इस मंदिर की बूंदों से ही मानसून का आंकलन करके फसल बुवाई व कटाई की तैयारी करते हैं।

मंदिर का इतिहास:

भगवान जगन्नाथ के इस मंदिर के निर्माण काल के विषय को लेकर इतिहासकारों और पुरातत्वविदों में मतभेद है। गर्भगृह के भीतर और बाहर के चित्रांकन के अनुसार इस मंदिर को दूसरी से चौथी शताब्दी का माना जाता है। लेकिन कुछ ऐसे भी निसान मौजूद हैं जिससे ये कयास लगाया जाता है की इस मंदिर का निर्माण सम्राट हर्षवर्धन के समय का है। वही कुछ इतिहासकारों की माने तो इस मंदिर का निर्माण 4000 साल पूर्व हुआ था। हालांकि इस रहस्य को जानने के लिए कई बार प्रयास हो चुके हैं पर तमाम सर्वेक्षणों के बाद भी मंदिर के निर्माण तथा रहस्य का सही समय पुरातत्व वैज्ञानिकों को मालूम नहीं चल सका। बस इतना ही पता लग पाया कि इस ऐतिहासिक मंदिर का अंतिम जीर्णोद्धार 11वीं सदी में हुआ था।

 

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