बागी बलिया : जाति तय करेगी सियासत या ‘बागी’ होंगे हिट

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अरुण मिश्र/ हिमांशु शर्मा: आजादी के दौरान आग्रेजों के खिलाफ बिगुल फूंकने वाले बागी बलिया का इतिहास विद्रोही तेवर के रूप में जाना जाता रहा है। राजनीति और प्रशासनिक तौर पर बलिया जिला बिहार सीमा से लगा है। दो बडी नदियां गंगा और घाघरा जिले को सिंचित करती है। यूं कहें तो भौगोलिक तौर पर यह इलाका खेती बाड़ी के लिए मशहूर रहा है। लेकिन इससे इतर यह जिला गंगा नदी की तरह शांत तो घाघरा की प्रलयकारी लहरों की तरह सत्ता व्यवस्था के खिलाफ हिलोरे मारता रहा है सात विधानसभा सीटों वाले इस जिले की सियासत बीते ढाई दशक से सपा-बसपा के इर्द-गिर्द घूमती रही है। पूर्वांचल में जातिवादी राजनीति का मिथक 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान टूटा तो यह वर्ष 2017 के विधानसभा एवं 2019 के लोकसभा चुनाव तक जारी रहा। मगर इस बार यहां की सियासी माहौल थोड़ा बदला बदला सा दिख रहा।

एकतरफा वोटिंग है सपना

बलिया तहसील… दिन सोमवार.. दोपहर दो बजे रहे। तहसील के बाहर चाय की दुकान पर बैठे वादकारियों वकीलों के बीच बहस का एक ही मुद्दा… अबकी बार किसकी सरकार…..सियासी खेमें में बटें वकील से लेकर वादकारी तक अपने-अपने दावे। भीतरघात से बागी तेवर अपनाए प्रत्याशियों के वजूद तक मानो एक-एक गांव व मुहल्ले के वोट की गुणा- गणित इसी चाय की दुकान पर तय हो रही हो। इस बीच कुल्हड़ को फेंककर धोती को कमर में बांधते सिकंदरपुर के राम अधार चौबे उठ खडे हुए… बोले, तोहरा लोग इहै बैठके कुछो कहीं जा…. अबकी लहर नइखे जो एकतरफा के सपना देखत बानी….. आप लोग भूल जाई सपना देखब…( यानी आप लोग कुछ भी कहें, इस बार किसी भी दल की लहर नहीं है। एकतरफा वोट पडने का सपना छोड दीजिए.

Voting

भीतरघात से परेशान है बीजेपी

इस बार बलिया की तीन से चार सीटों पर चुनाव दिलचस्प होने जा रहा। इनमें प्रदेश के मंत्री उपेन्द्र तिवारी एवं आनन्द स्वरूप शुक्ला की प्रतिष्ठा भी दांव पर है।

वरिष्ठ पत्रकार रवीन्द्र मिश्र कहते हैं कि योगी सरकार में मंत्री आनन्द स्वरूप शुक्ला पिछली बार बलिया नगर विधानसभा सीट से चुनाव जीते थे।  इस बार पार्टी ने उनका सीट बदलकर उन्हें बैरिया विधानसभा सीट से चुनाव में उतार दिया है। जबकि इस सीट से दावेदार थे चर्चित विधायक सुरेन्द्र सिंह।  भाजपा नेतृत्व ने उनका टिकट काट दिया।  लिहाजा सुरेंद्र सिंह बागी प्रत्याशी के रूप में चुनावी मैदान में हैं।

बीजेपी को यहां अपने परम्परागत वोटरों को सहेजने में कडी मेहनत करनी पड रही है।

वरिष्ठ पत्रकार सुधीर ओझा का दावा करते है की इस बार बलिया की सभी सीटों पर कांटे की टक्कर है।  पिछले पांच साल से टिकट की उम्मीद लगाए कई नेताओं को टिकट नहीं मिलने से भीतरघात की सबसे अधिक आशंका है। यह स्थिति सभी दलों में है।  ओझा बताते है की 2017 में सात सीटों में से बीजेपी को पांचसपा-बसपा को एक-एक सीट हासिल हुई थी।  लेकिन इस बार बीजेपी को क्लीन स्वीप जैसी स्थिति नहीं दिखायी पड रही।  इसलिए भी कि तीन सीटों पर बागी उम्मीदार भी चुनावी मैदान में होने से सीटें फंसी हुई हैं

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सिर्फ इतना ही नहीं बलिया के चुनाव में बहुजन समाज पार्टी को भी कमतर आंकना भूल साबित हो सकता है। बीएसपी का अपना वोट बैंक है। दूसरे बीएसपी ने जातिगत समीकरण को ध्‍यान में रखकर प्रत्‍याशी उतारे हैं। सिर्फ बीएसपी ही नहीं सभी सियासीदलों ने इस बार जातिगत समीकरण पर सबसे अधिक जोर दिया है। यानी जिस विधानसभा में सबसे अधिक जिस जाति के वोटर हैं उस जाति के प्रत्याशी को चुनावी मैदान में उतारकर चुनावी जीत का चक्रब्यूह तैयार किया है। जिससे कि अपनी बिरादरी के वोट के साथ ही अन्य में सेंधमारी कर जीत सुनिश्चित की जा सके।

ग्रामीण इलाकों में सियासी माहौल पर पैनी नजर रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार अजीत कुमार का दावा है कि इस बार बीएसपी का कोर वोटर अपने पार्टी के ही प्रत्‍याशी को वोट देता आया है और देगा. इसलिए परिणाम अगर कुछ बदल भी जाये तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।

फेफना के किसान शिवकुमार राय कहते हैं कि सरकार ने काफी काम किया लेकिन पेट्रोल डीजल के साथ महंगाई से सभी परेशान हैं। बलिया में (किसके खाते में कितनी सीट जाएगी) के सवाल पर कहते हैं कि इस बार यहां सभी सीटो पर त्रिकोणीय संघर्ष है। जो सवर्णो के साथ पिछडों को साध लिया उसी की जीत होगी। 

गर क्षेत्र के व्यापारी मनोज कुमार एवं आनन्द भूषण तिवारी बताते है कि शहरी इलाके में पिछली बार की अपेक्षा माहौल बदला है। आगामी तीन मार्च को होने वाले चुनाव में सियासी लहर किसकी ओर होगी यह तो 10 मार्च को ईवीएम खुलने के बाद ही पता चलेगा।  मगर माहौल में तारी सियासी तपिश के बीच बलिया जिले के दो मंत्रियों की प्रतिष्ठा फंस गई है।

बलिया की विधानसभा सीटें-

बलिया जिले में कुल सात विधानसभा सीटें है। इनमें रसडाबेल्थरारोडसिकंदरपुरबांसडीहफेफनाबलिया नगर और बैरिया शामिल है। 

*कसौटी पर कई बडे नेता*

चुनावी मैदान में उतरे दिग्गज नेताओं में इस बार सरकार में मंत्री उपेन्द्र तिवारी, आनन्द स्वरूप शुक्ला, विधानसभा में विपक्ष के नेता रामगोविंद चैधरी, सपा के पूर्व मंत्री नारद राय, बसपा के विधायक उमाशंकर सिंह एवं सरकार में मंत्री रही स्वाति सिंह के पति दयाशंकर सिंह प्रमुख रूप से है। इस बार जनता की कसौटी पर कौन खरा उतरेगा यह आने वाला वक्त बताएगा।

2012

 

2012 में दौड़ी थी साइकिल

2012 में बलिया जिले के सात विधानसभा में कुल वोटर्स की संख्या 22,44,298 लाख थी।  उसमें से 52.8 प्रतिशत मतदाताओं (11,85,954 लाख) ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया।  समाजवादी पार्टी को सर्वाधिक 29.3 प्रतिशत वोट मिले थे। बहुजन समाज पार्टी 23.1 प्रतिशत वोट के साथ दूसरे नंबर पर थी। बीजेपी को तीसरे नंबर पर संतोष करना पड़ा था उसे 15.5 प्रतिशत वोट ही हासिल हो सका था। कांग्रेस की स्थिती तो यहां बहुत ही खराब रही है। उसे महज 6.6 प्रतिशत वोट ही मिला। सुहेलदेव  भारतीय समाज पार्टी 12.4 प्रतिशत वोट हासिल करने में कामयाब रही।

2017 

2017 में खिला था कमल

वहीं 2017 की बात करें तो बलिया में वोटर्स की संख्या में इजाफा हुआ। अब यहां कुल वोटर्स 23,56,157 हो चुके थे। इस बार के विधानसभा चुनावों में 54.1 प्रतिशत (12,75,412) लोगों ने वोट डाले। इस चुनाव में बीजेपी बलिया में सबसे बड़ी पार्टी साबित हुई इसका वोट परसेंट 34 प्रतिशत रहा. समाजवादी पार्टी 27 प्रतिशत वोट के साथ दूसरे स्‍थान पर रही। बहुजन समाज पार्टी को 25.5 प्रतिशत वोट मिले। निर्दलीय प्रत्‍याशियों ने भी अपने हिस्‍से में 7.6 प्रतिशत वोट कमाया. सुहेलदेव  भारतीय समाज पार्टी को 3.2 प्रतिशत मत हासिल हुआ।

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