सब्जी बेचकर बनवाया गरीबों के लिए अस्पताल, कायम की मिसाल

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यह एक असंभव-सी बात का संभव हो जाना है। सब्जी बेचकर बचाए पैसों से गरीबों के लिए मुफ्त अस्पताल बना देने के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता। सुभाषिणी मिस्त्री ने इसे पॉसिबल कर दिखाया है। खुद के लिए तो सभी जीते हैं, लेकिन जो दूसरों के लिए जीता है वही सच्चा इंसान होता है। पश्चिम बंगाल की सुभाषिनी मिस्त्री भी दूसरे के जीती हैं और यही बात उन्हें खास बनाती है।

पति सब्जी बेचते थे। इसी से घर का खर्च चलता था

उन्होंने सब्जी बेचकर बेटे को डॉक्टर बनाया और गांव में गरीबों के लिए मुफ्त का अस्पताल खोला। क्यों है न बड़ी बात! तभी तो उन्हें इस बार पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। 1943 में गुलाम भारत में पैदा हुईं सुभाषिनी मिस्त्री 14 भाई-बहन थीं। पिता गरीब थे। अकाल पड़ा तो सुभाषिनी के 7 भाई-बहनों की मौत हो गई। सिर्फ 12 वर्ष की उम्र में उनकी शादी हो गई और 23 साल होते-होते 4 बच्चे भी हो गए। सुभाषिनी के पति सब्जी बेचते थे। इसी से घर का खर्च चलता था। कमाई इतनी कम थी कि घर की स्थिति अच्छी नहीं थी।

20 साल की मेहनत का फल

एक दिन पति बीमार हो गए। बीमारी बड़ी नहीं थी, लेकिन गांव में अस्पताल नहीं था। सुभाषिनी उन्हें गांव से दूर जिला अस्पताल, टॉलीगंज ले गईं, लेकिन पैसे की कमी की वजह से इलाज नहीं हुआ और उनकी मौत हो गई। सुभाषिनी के मन में यह बात अंदर तक बैठ गई कि पैसे की कमी की वजह से उन्हें पति को खोना पड़ा।

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अमूमन जब किसी भी इंसान के सामने ऐसी परिस्थिति आती है तो उसके पास तीन रास्ते होते हैं। पहला यह कि ऐसी घटनाओं को नियति मान ले और भाग्य को कोसते रहे। दूसरा यह कि मेहनत करें और खूब पैसा कमाएं और अपनी स्थिति को मजबूत कर लें ताकि भविष्य में पैसे की दिक्कत नहीं हो। तीसरा रास्ता उनका होता है जो जीवट वाले होते हैं और दूसरों के लिए सोचते हैं।

मेहनत के साथ त्याग भी करना पड़ता है

इस रास्ते पर चलने वाले कुछ ऐसा कर देते हैं कि बाकियों का रास्ता आसान हो जाता है। हालांकि इस रास्ते में मेहनत के साथ त्याग भी करना पड़ता है। सुभाषिनी मिस्त्री ने इसी रास्ते को अपनाया। उन्होंने 20 बरस तक मेहनत की, सब्जी बेची, मजदूरी से कमाया, लोगों के यहां चौका-बर्तन साफ किया और पैसे कमाए। इन पैसों से घर चलाया, बच्चों को भी पढ़ाया और अस्पताल के लिए भी कुछ-कुछ जमा करती रहीं। एक समय ऐसा आया जब उन्होंने 10,000 रुपये में एक एकड़ जमीन हॉस्पिटल के लिए खरीद ली।

अस्पताल

1993 में सुभाषिनी ने ट्रस्ट खोला और इसी ट्रस्ट की मदद से 1995 में हॉस्पिटल की नींव रखी गई। सुभाषिनी ने गांववालों के सामने जब हॉस्पिटल के बारे में बताया तो बात उन्हें यह बात खूब पसंद आई। सभी ने थोड़ा-थोड़ा योगदान दिया और फूस से बना अस्पताल तैयार हो गया। यह अस्पताल गरीबों के लिए खोला गया था। गरीबों को इससे काफी फायदा हुआ।

स्थानीय लोग और एमएलए ने भी सहयोग दिया

कच्चे घर में बारिश के समय मरीजों को काफी परेशानी हो जाती थी। कई बार तो क्लिनिक में पानी जमा हो जाने की वजह से सड़क पर इलाज करना पड़ता था। ऐसे में सुभाषिनी और उसके बेटे अजोय ने पक्के मकान के बारे में सोचना शुरू किया। इसके लिए वह अपने एरिया के एमपी से भी मिले। बाद में स्थानीय लोग और एमएलए ने भी सहयोग दिया।

अद्भुत प्रयास लोगों के सामने आया

सभी के प्रयासों से हजार वर्गफीट का अस्पताल तैयार हो गया। इसका उद्घाटन पश्चिम बंगाल के राज्यपाल ने किया। राज्यपाल की मौजूदगी ने कुछ स्थानीय मीडिया को भी आकर्षित किया। इसके बाद सुभाषिनी मिस्त्री का यह अद्भुत प्रयास लोगों के सामने आया। उनके इस प्रयास के लिए उन्हें इस साल पद्मश्री से नवाजा गया है। सुभाषिनी कहती हैं कि मुझे असल पुरस्कार तो अस्पताल के शुरू होने से ही मिल गया था। सुभाषिनी के ट्रस्ट में अब तमाम बड़े लोग जुड़ गए हैं और कई नए डिपार्टमेंट खुल गए हैं। ट्रस्ट के पास 3 एकड़ जमीन है और अस्पताल का दायरा 9,000 वर्ग फीट का हो चुका है।

NBT

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