‘‘अंधा है मार दो…” के ताने खाने वाले नेत्रहीन ने 23 साल में खड़ी कर दी करोंड़ो की कंपनी

पढ़े रील से पहचान में आने वाले रियल हीरो श्रीकांत की कहानी ....

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भारत में हर मां – बाप एक लड़के का ख्वाब देखते हैं, यह ख्वाब कुछ इस कदर हावी है कि, कई जगहों पर लड़के की जगह पैदा होने वाली लड़कियों को मौत के घाट उतार दिया जाता है. ऐसी मानसिकता वाले समाज में 7 जुलाई 1992 को आंध्र प्रदेश के छोटे से गांव मचिलीपटणम के रहने वाले दामोदर राव और वेंकटम्मा के घर जब बेटा पैदा हुआ तो, समाज और परिवार के कई सारे लोगों ने उन्हें सलाह दी कि, उसे अभी मार दो, वरना जिंदगी भर इसका बोझ ढोते फिरोंगे, ये किसी काम का नहीं.

वह बस इसलिए क्यों कि वह बच्चा जन्म से ही अंधा था. लेकिन उस बच्चे के मां – बाप ने फिलहाल किसी की नहीं सुनी और अपने उस नेत्रहीन बच्चे को किसी सामान्य बच्चे के जैसे रखने और पालने का फैसला कर लिया. इस भरोसे के साथ की यह भगवान को तोहफा है और कुछ अच्छा जरूर करेंगा.

बडे पर्दे पर उतारी गयी श्रीकांत की कहानी

भगवान की कृपा और उसके मां बाप के भरोसे का ही फल था कि, बिल्कुल ऐसा हुआ. वह अपनी अंधकार भरी दुनिया में ऐसा चमका कि उसकी पहचान श्रीकांत बोला के तौर पर दुनिया भऱ में रौशन हो गयी. उसी बच्चे ने भेदभाव महसूस कराने के आरोप में सरकार को कटघरे में खड़ा करा दिया. उसी बच्चे ने दिवंगत राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम को क्या बनाना चाहते हो के जवाब में कहा कि, वह देश का पहला विजुअली इम्पेयर्ड प्रेजीडेंट बनाना चाहता है. उस बच्चे ने दुनिया भर की बड़ी कंपनियों के ऑफर ठुकराकर खुद की कंपनी खोल कर नेत्रहीन लोगों की जिंदगी में रौशनी भरने का काम किया. इन्हीं श्रीकांत बोला की प्रेरणादायी कहानी को हम 10 मई से बड़े पर्दे पर देख सकते हैं और कुछ लोग इसे देख भी चुके हैं. इस फिल्म में श्रीकांत बोला का किरदार निभा रहे हैं राजकुमार राव.

फिल्म को ‘सांड की आंख‘ के निर्देशक तुषार हिरानंदानी ने बनाया है. श्रीकांत की कहानी को पंजाबी फिल्म ‘किस्मत’ के राइटर-डायरेक्टर जगदीप सिद्धू और सुमित पुरोहित ने ‘स्कैम 1992’ और ‘प्देपकम म्कहम’ की राइटिंग टीम में काम किया. राजकुमार राव हमें श्रीकांत के रूप में दिखेंगे. हमें देखना होगा कि तुषार हिरानंदानी और राजकुमार राव श्रीकांत की कहानी कैसे सुनाते हैं. लेकिन इससे पहले आपको श्रीकांत के जीवन की कहानी बताने जा रहे हैं…

स्कूल में करना पड़ा भेदभाव का सामना

एक छोटे से गांव से आने की वजह से श्रीकांत के मां-बाप चावल की खेती किया करते थे. ऐसे में उन्हें भी हाथ बटाने के लिए खेत पर ले जाते थे. लेकिन नेत्रहीन होने की वजह से श्रीकांत फिलहाल किसी भी काम में मदद न कर पाते थे. ऐसे में उनके मां-बाप ने ये फैसला किया कि उन्हें स्कूल भेजा जाय. उसे पढाई लिखाई में बेहतर बनाया जाए. इसके साथ ही उन्होंने पास के ही एक स्कूल में उनका दाखिला करा दिया, इस स्कूल में श्रीकांत अकेले पैदल ही जाया करते थे.

श्रीकांत को स्कूल में लास्ट बेंच पर बैठाया जाता था. जब गेम्स पीरियड की घंटी बजती थी तो पूरी क्लास ग्राउंड में चली जाती. श्रीकांत भी उम्मीद करते कि कोई उनके साथ खेलेगा, लेकिन हर बार हताशा हाथ लगती. उन्हें अपने साथ कोई नहीं खिलाता था. एक इंटरव्यू में श्रीकांत बताते हैं कि, अकेलापन उन्हें कच्ची उम्र में ही खाने लगा था. चाहकर भी इस बारे में कुछ नहीं कर पा रहे थे. घर पर बेटे की हालत मां-बाप को मालूम हुई. यही कारण है कि एक मित्र ने सुझाव दिया कि श्रीकांत को स्पेशल स्कूल में दाखिला देना चाहिए. श्रीकांत को रिश्तेदार की बात मानकर हैदराबाद के देवनार स्कूल फॉर ब्लाइंड में भर्ती कराया गया.

लेकिन यह स्कूल उनके घर से करीब 250 किलोमीटर दूर था. ऐसे में महज सात साल की उम्र में परिवार छोड़ना बोला को काफी मुश्किल हो रहा था. ऐसे में बोला ने स्कूल से भागने का फैसला लिया और भाग आए. इसके बाद एडमिशन करवाने वाले रिश्तेदार ने उन्हें समझाते हुए एक सवाल किया कि घर पर तुम्हें कैसी जिंदगी मिलेगी ? इस सवाल ने बोला को चुप कर दिया और उसके बाद बोला कभी स्कूल से नहीं भागे.

भेदभाव को लेकर सरकार से की बगावत

पढ़ाई में अव्वल रहने वाले बोला ने पढाई के साथ साथ कई सारी स्किल पर भी काम करना शुरू कर दिया था, इसमें लेखन, चेस और क्रिकेट शामिल था. इसके साथ ही बोला ने स्कूल के दिनों में ही कम्प्यूटर सीखना शुरू कर दिया. यही वजह थी कि, वे दसवीं के बाद क्या करना है के सवाल के जवाब के साथ तैयार थे.

दसवीं के रिजल्ट में 90 प्रतिशत अंक पाने वाले बोला ने साइंस लेने का फैसला किया तो स्कूल ने माना कर दिया और स्टेट बोर्ड का हवाला देते हुए कहा कि, चाहो तो, आर्ट ले लो, लेकिन साइंस नहीं. यही से शुरू हुई बोला की सरकार के भेदभाव को लेकर बगावत की लड़ाई और उस मुद्दे को लेकर श्रीकांत कोर्ट पहुंच गए.

उनकी याचिका की सुनवाई के छह माह बाद उनको सरकार ने साइंस पढने की इजाजत दे दी. सरकार से इजाजत मिलने के बाद अब पढाई को लेकर चौलेंज था. क्योकि स्टेट बोर्ड में विजुअली चैलेंजेट स्टूडेट्स के लिए साइंस पढाने की कोई सुविधा नहीं है, ऐसे में श्रीकांत ने अपनी बहुत सी किताबों को ऑडियो बुक्स में बदल दिया और पढ़ाई में कोई कमी नहीं हुई. इसलिए श्रीकांत बोला ने 12 वीं की परीक्षा 98 प्रतिशत रिजल्ट के साथ पास किया.

आईआईटी ने दाखिला देने से किया था इंकार

साइंस ले लो फिर तो ऐश वाले सिद्धांत को पार कर चुके बोला राहत की सांस लेना ही चाहते थे कि, उनकी जिंदगी में इससे बड़ी समस्या मुंह बाएं खड़ी थी. साइंस में अच्छे नंबर से पास होने के बाद बोला इंजीनियरिंग करना चाहते थे. इसे लिए उन्होंने आईआईटी और बीआईटीएस जैसे कॉलेज में दाखिले की अर्जी भरी. लेकिन इन कॉलेजों ने उनके हाथ में एक लेटर थमाते हुए कहा कि आप देख नहीं सकते, इसलिए आपको कम्पेटिटिव एग्ज़ाम में बैठने नहीं दिया जा सकता. श्रीकांत को बुरा लगा, पर हताश नहीं हुए. सोचा कि आईआईटी मुझे नहीं चाहती तो मुझे भी आईआईटी नहीं चाहिए.

इसके बाद बोला इंटरनेट पर अपने लिए ऑप्शंस खोजने लगे, अमेरिकी विश्वविद्यालयों के बारे में पता चला. इसके बाद वहां के सर्वश्रेष्ठ चार कॉलेजों (MIT, बर्कली, स्टैनफोर्ड और कार्नेजी मेलन) में दाखिले की अर्जी डाली. ऐसे में जहां भारत के एक भी कॉलेज ने उनको दाखिला नहीं दिया था. वहीं अमेरिका के चारों कॉलेज में उन्हें दाखिला मिल गया. श्रीकांत ने MITमें शामिल होने का फैसला किया. वह MIT के इतिहास में पहले अंतर्राष्ट्रीय विद्यार्थी बन गए और स्कॉलरशिप भी मिली.

श्रीकांत के विजन ने हर किसी को किया प्रभावित

MIT से इंजीनियरिंग की पढाई पूरी करने के बाद बोला के पास इंटरनेशनल कंपनियों में काम करने के हजारों ऑफर थे. लेकिन कुछ अलग करने की ठान चुके बोला ने उन सभी ऑफरों को ठुकराकर हैदराबाद आ गए और एक इंटरव्यू में बोला बताते है कि, ‘‘कब तक एक डिसेबल्ड बच्चे को क्लास की आखिरी सीट के लायक ही समझा जाएगा. इंडिया की 10 पर्सेंट आबादी जो डिसेबल्ड है, वो क्यों उसकी अर्थव्यवस्था में अपना योगदान नहीं दे सकती. इन सवालों का जवाब उन्होंने खुद ढूंढा. वो जानते थे कि अपने जैसे और बाकी लोगों के बीच का फर्क सिर्फ एजुकेशन और स्किल से ही दूर किया जा सकता है. विज़ुअली चौलेंज्ड बच्चों के लिए कंप्यूटर ट्रेनिंग सेंटर खोला.

पैसे जुटाए, एक बिल्डिंग किराये पर ली, पांच कंप्यूटर खरीदे, एक फैकल्टी मेम्बर को नौकरी दी और कंप्यूटर क्लासेस शुरू हो गयी. बच्चों को शिक्षा तो दे दी, लेकिन उनका भविष्य क्या होगा? श्रीकांत ने खुद ही इसका समाधान निकाला. वह अपनी पढ़ाई पूरी कर भारत आने के कुछ समय बाद ही पैसे जुटाने में लग गए. कुछ साल बाद लाख रुपये जुटाने के बाद बोलांट इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड की शुरुआत हुई, जो इको-फ्रेंडली डिस्पोज़ेबल उत्पाद बनाती है.

ये उत्पाद पूरी तरह से पत्तों और recycled कागज से बनाए जाते हैं. उत्पाद बोलांट के उत्पाद पोर्टफोलियो में डिस्पोज़ेबल प्लेट, डोने और पेपर कप्स शामिल हैं. श्रीकांत के विजन ने बहुत लोगो को प्रभावित किया जिनमें से एक है रतन टाटा. जिन्होंने श्रीकांत की कंपनी में भी निवेश किया. एक एन्यूअल रिपोर्ट के अनुसार, बोलांट ने 2018 में पांच उत्पादन प्लांट शुरू किए, जिसमें 150 करोड़ रुपये का टर्नओवर था.

 

 

 

 

 

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