काशी का प्रसिद्ध रथयात्रा मेला शुरू, निकली कालभैरव की भव्य शोभायात्रा

भगवान जगन्नाथ, भैया बलभद्र और बहन सुभद्रा के काष्ठ विग्रह को अष्टकोणीय रथ पर कराया गया विराजमान

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काशी के सप्रसिद्ध तीन दिवसीय रथयात्रा मेले की शुरुआत रविवार अलसुबह भाई-बहन के साथ भगवान जगन्नाथ की दिव्य मंगला आरती के साथ शुरू हो गई. भक्त के दर्शन के लिए पहुंचने लगे. भोर में ही भगवान जगन्नाथ, भैया बलभद्र और बहन सुभद्रा के काष्ठ विग्रह को अष्टकोणीय रथ पर विराजमान कराकर पीताम्बर वस्त्र धारण कराया गया. स्वर्ण मुकुट एवं आभूषण पहनाने के साथ बेला, गुलाब, चंपा, चमेली, तुलसी की मालाओं से श्रृंगार किया गया. अब तीन दिन तक बाबा श्रीकाशी विश्वनाथ की नगरी भगवान जगन्नाथ के आराधना में लीन रहेगी. मेला क्षेत्र में रौनक है और पूरा क्षेत्र जय जगन्नाथ, हर-हर महादेव के गगनभेदी उद्घोष से गूंज रहा है. भगवान का रथ छूकर श्रद्धालु निहाल हो रहे हैं. पूरे श्रद्धाभाव से प्रभु को फल-पुष्प और तुलसी की माला अर्पित कर अपने को धन्य मान रहे हैं.

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14 पहियों के रथ पर सवार भगवान जगन्नाथ, भैया बलभद्र और बहन सुभद्रा की अप्रतिम छवि भक्तों को आकर्षित कर रही है. 1802 में काशी में शुरू हुए भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा का यह 222 वां वर्ष है. गौरतलब है कि भगवान जगन्नाथ को शनिवार की दोपहर बाद अस्सी स्थित जगन्नाथ मंदिर स्थित मूल स्थान से भाई-बहन के साथ डोली में लाया गया था. 15 दिन तक अस्वस्थ रहने के बाद उपचार के बाद स्वास्थ्य हुए. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार वह अपनी मौसी के घर आहार-बिहार और मनफेर के लिए आए हैं

रथयात्रा के पहले दिन निकली कालभैरव की भव्य शोभायात्रा

वाराणसी में विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा मेले के पहले दिन बाबा कालभैरव के पंचबदन प्रतिमा की भव्य शोभायात्रा निकाली गई. चौखंभा स्थित काठ की हवेली से स्वर्णकार क्षत्रिय कमेटी के तत्वावधान में शोभायात्रा निकली. सुसज्जित छतरी युक्त घोड़ों पर देव प्रतिमाएं राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, हनुमान, शंकर, गणेश, नारद, ब्रह्माजी के साथ दो दरबान भी विराजमान थे.डमरू दल भी शामिल हुआ. शोभायात्रा के अंत में शहनाई की धुन के बीच साज-सज्जा के साथ फूलों से सुसज्जित बाबा का स्वर्णिम रथ देखते बन रहा था. शोभायात्रा काठ की हवेली से प्रारंभ होकर बीवीहटिया, जतनबर, विशेश्वरगंज, महामृत्युंजय, दारानगर, मैदागिन, बुलानाला, चौक, नारियल बाजार, गोविंदपुरा, ठठेरी बाजार, सोराकुआं, गोलघर, भुतही इमली होते हुए कालभैरव मंदिर पर जाकर संपन्न हुई.

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